Saturday, May 25, 2024
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सही को पहचानो

कहना है, सब को सच्ची, एक बात है, कहना

झुटी बातें और  भरम में, कभी कभी न बहना

 

कोई मीठा मीठा बोले, कोई करे अगुवाई

असली बात वही है या, है उसकी परछाई

बढे बढे तो, ठग बैठे है, चले अब लुटवाने

मन का परदा अभी भी खोलो, सच को अभी ही जाने-१

 

बात फंसी है भूतकाल में, बार बार क्यों उकेरे

अच्छे खासे मन के भीतर, शंका कभी न भरे

वर्तमान ही तो जीवन है जों, अभी इसी काल जिए

अपने मन को होश में रखकर, अच्छा जी लीजिए-२

 

शंका में, फालतु बातों का पहाड़ न बनाये

आने वाले तनाव को अब यैसे दुर भगाएं

सही काम को करते जाओ, सही बात को मानो

आँख खोलकर, साक्षात् जों है, सही को पहचानो -३

 भावार्थ

  • दुनिया में बढे बढे ठग बैठे है. कोई मीठा बोलकर फ़साने वाले तो कोई हंसकर फसाने वाले बैठे है. अपने आपको भ्रम में रखकर कहीं फ़साना नहीं है.
  • भूतकाल की बात जरुरी नहीं है तो उसे बार बार याद करने से कोई मतलब नहीं है. मन की शंका इतनी जादा न हो की सच्ची बात पर कोई परदा आ जाएँ.
  • शंका में रहकर तनाव को निमत्रण देने की बजाय आखों के सामने जों चल रहा है वह साक्षात् देखे और सच्चाई को स्वीकार करे.

                                                       – वेचानसिंह सुलिया(जीवनदर्शन समूह)

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Wechansing Suliya
Wechansing Suliyahttps://jiwandarshan.com
I am Professor of HR and OB. I am Author, Poet and Singer. I organize workshop on personality development and entrepreneurial development for General public and in education institutions.
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